कभी आपने सुना है किसी मुसलमान को रामायण और महाभारत का पाठ करते हुए? शायद नहीं। लेकिन, आज इस लेख के जरिए मैं एक ऐसे शख्स से रूबरू कराऊंगा जो अपनी कला के जरिए समाज में आपसी सदभाव बढ़ाने में विश्वास रखता है। आज के युग में यह इसलिए और भी अहम हो जाता है कि देश में हर तरफ नफरत और भ्रष्टाचार का बोलबाला है।
और ये शख्स कोई और नहीं, आदित्य विक्रम बिरला कला किरण पुरस्कार से सम्मानित अलवर का मशहूर भपंग वादक उमर फारूख मेवाती हैं। इनकी परवरिश एक मुस्लिम घराने में तो जरूर हुई लेकिन , बचपन से उन्हें महाभारत और रामायण के किस्सों से काफी लगाव था। जिसके चलते वो महाभारत और रामायण के किस्से लिखते औऱ गाते रहे हैं। सादुल्ला खां और नबी खां द्वारा लिखित महाभारत के किस्सों को उमर पांच भागों में गाते हैं। इसमें सबसे रोचक बात यह है कि इन्हें सुननेवाले भी मुस्लिम ही होते हैं। इसके अलावा मशहूर भपंग वादक उमर फारूख जब भपंग की तान छेड़ते हैं तो हर किसी के पांव थिरकने और होंठ अपने आप हिलने लगते हैं।
दरअसल, भपंग एक ऐसा लोक वाद्य है जिसकी उत्पति शिव जी के डमरू से मानी जाती है। इसे पूर्वी राजस्थान में मुस्लिम जोगी जाति शिवरात्री पर शिव अराधना के लिए शिवालयों में भपंग बजाती है।
मुस्लिम जोगी परिवार से संबंध रखने वाले उमर फारुख को भपंग वादन कला अपने विरासत में मिली है। इनके पिता जहूर खान भी अपने जमाने में काफी मशहूर कालकारों में से एक थे, जिन्होंने महमूद की सुपर हिट हिंदी फिल्म ‘आंखे’ में ‘दे दाता के नाम तुझको अल्लाह रखे’ गीत पर भपंग बजाया था। उमर फारुख ने भी अपने पिता का सम्मान रखते हुए इस कला को राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने की पूरी कोशिश की। कई राष्ट्रीय औऱ राजकीय सम्मान के अलावा पिछले साल कलर्स चैनल पर इंडिया गॉट टैलेंट में भी उन्हें भपंग बजाने और गाने का मौका मिल चुका है। इसके अलावा उमर 40 देशों में भपंग वादन लोक कला का प्रदर्शन कर चुके फारूख की धुन पर प्रिंस चार्ल्स भी झूम चुके हैं। ईडन प्रोजेक्ट सम्मान इंग्लैण्ड, कला प्रिय फाउण्डेशन शिकागो अमेरिका, डेलिप्मक गैम्स जेजू दक्षिण कोरिया जैसे अतर्राष्ट्रीय पुरस्कार के अलावा गुजरात लोककला राष्ट्रीय गौरव पुरस्कार, युवा पुरस्कार राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, व अलवर गौरव आर.डी.एस.सी. मित्तल फाउण्डेशन पुरस्कार से भी उन्हें सम्मानित किया जा चुका है।
लेकिन, विदेशों में सोहरत और बुलंदियों पर पहुंचने के बावजूद उमर को इस बात का मलाल है कि उन्हें अपने ही देश में उन्हें संरक्षण नहीं मिलता। आनेवाले दिनों में लुप्त होते जा रहे लोक वाद्य जोगिया सारंगी, चिकारा, चीमटा, ढोलक, नगाड़ा और भपंग को उमर जिंदा रखना चाहते हैं। लोक कला को जिंदा रखने की इसी जनून की वजह से उन्हें भपंग कला एवं शिक्षा समिति की स्थापना करनी पड़ी। आज इस समिति के जरिए घर औऱ गांव के नौजवान भपंग कला को सीखते हैं, जिनमें उनका एक 4 साल का बच्चा भी शामिल है।
लेकिन, इस कला को आने वाली पीढ़ी तक कैसे बरकरार रखा जाए, लोक कला प्रेमियों के लिए एक बड़ी चुनौती है। हालांकि, तकनीक युग में सब मुमकिन है। डिजिटल एंपावरमेंट फाउंडेशन ने कालबेलिया, भपंग लोकवाद्य औऱ लोक कलाओं के विकास और संरक्षण करने का फैसला किया है। जिसके तहत एक ऐसे लाइब्रेरी का निर्माण करना है जहां प्रोग्राम की रिकॉरडिंग कर वेबसाइट पर अपलोड करना, सीडी, डीवीडी में संरक्षित की सुविधा मौजूद ही। इसके अलावा लाइब्रेरी में एक ऐसी व्यवस्था भी होगी जहां इंटरनेट के जरिए कलाकार अपनी कला को निखारने के लिए नई जानकारी हासिल कर सकेंगे। वहीं दूसरी तरफ गांव के बच्चे, बुढ़े. महिलाएं कंयूटर शिक्षा भी हासिल कर सकेंगे।
ओसामा मंजर
लेखक डिजिटल एंपावरमेंट फउंडेशन के संस्थापक निदेशक और मंथन अवार्ड के चेयरमैन हैं। वह इंटरनेट प्रसारण एवं संचालन के लिए संचार एवं सूचनाप्रौद्योगिकी मंत्रालय के कार्य समूह के सदस्य हैं और कम्युनिटी रेडियो के लाइसेंस के लिए बनी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की स्क्रीनिंग कमेटी के सदस्यहैं।




